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अटल समाचार, माउंट आबू (राजस्थान)

जयगच्छाधिपति आचार्य प्रवर श्री पार्श्वचंद्र जी महाराज साहेब, प्रवचन प्रभावक डॉ. श्री पदमचंद्र जी महाराज साहेब आदि ठाणा 5 के सानिध्य में गतिमान श्री जयमल जैन आध्यात्मिक ज्ञान ध्यान संस्कार शिविर में आचार्य प्रवर श्री पार्श्वचंद्र जी महाराज साहेब ने तीसरे दिन शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए फरमाया कि हर व्यक्ति परिवर्तन चाहता है – खान पान में, रहन सहन में। परिवर्तन के लिए लोग लाखों करोड़ों खर्च करते हैं। कोई सत्ता परिवर्तन के लिए प्रयास करता है, कोई स्थान परिवर्तन के लिए अलग अलग प्रयत्न करता है। डॉक्टर रोगी के स्वास्थ्य के लिए उसके आहार विहार में परिवर्तन की सलाह देता है। व्यक्ति अपने परिवेश और पहनाव में परिवर्तन करता रहता है। पर वास्तव में परिवर्तन चित्त और चरित्र का होना चाहिए। मानव का मानस अनेक प्रकार की वृत्तियों प्रवृत्तियों से विकृत है। वह विकृति अन्तःस्तल को अत्यधिक प्रभावित करती जा रही है जिससे मनुष्य का जीवन विकृत बनता जा रहा है। वह विकृति शनैः शनैः समाज में व्याप्त होती जा रही है। उस विकृति को बदलना होगा, उस परिस्थिति में बदलाव लाना अनिवार्य है।

वर्तमान में शिविरों की प्रासंगिकता इसीलिए है कि युवाओं के रहन सहन, खान पान, व्यवहार में अनचाही नयी नयी स्थितियां दृष्टिगोचर होने लगी है जो नितांत चिंता का विषय है। आज हर व्यक्ति साधनों संसाधनों के अधीन हो गया है। अधीन ही नही हो गया अपितु उनकी फैशन हो गई है। जिससे उनके स्वास्थ्य पर बहुत ही हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। जैसे निरंतर मोबाइल के प्रयोग से स्वभाव में चिड़चिड़ापन, भूलने की आदत अथवा झूठ बोलने की प्रवृत्ति, अभिभावकों से स्थिति परिस्थिति को छुपाना, जिसके चलते कई अप्रिय प्रसंग उपस्थित होते हैं। जिसमें शिविरार्थियों को सुझाव दिया गया – साधन का उपयोग केवल आवश्यकता के लिए किया जाता है न कि फैशन एवं अनुकरण करने के लिए। आज आवश्यकता के बजाय अनुकरण किया जा रहा है। यहाँ तक कि माताएं नन्हें बच्चों को खिलौने के रूप में मोबाइल उपलब्ध कराती है, परिस्थिति इतनी विकट हो गई है कि बच्चे बिना मोबाइल के खाना खाने के लिए तैयार नही होते, मचलने लग जाते हैं। क्या यह स्थिति बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त है? प्रायः देखा जाता है खाना खाते समय टी वी चालू होती है, किंतु यह बिल्कुल अनुचित है। भोजन अपने शरीर की सुरक्षा एवं आवश्यकता के लिए किया जाता है जिसमें पूर्णतः सजगता एकाग्रता रहनी आवश्यक है। किंतु इन साधनों के उपयोग से वह रहती नहीं जिससे विचार एवं स्वास्थ्य दूषित एवं मलीन होने की प्रबल संभावना रहती है।

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एक समय में एक ही काम हो, भगवान महावीर ने भी यही कहा- एक समय में एक काम करो, एक समय मे दो काम करना दोनों काम बिगाड़ने के समान है। इसके साथ वर्तमान में पहनाव में भी अनुकरण किया जा रहा है। वस्त्र शरीर की सुरक्षा एवं लज्जा रक्षा के लिये है किंतु उसमें फैशन और अनुकरण की भूमिका आ जाती है तो वहाँ दोनों ही बातें नही रह पाती फिर हमारी भारतीय संस्कृति में विकृति का तूफान सा आ जाता है जिसके दुष्परिणाम का अनुभव प्रायः सभी को है। शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए आचार्य प्रवर ने फरमाया की सभी प्रकार की विकृतियों से बचने के लिए स्वयं की प्रकृति के अंदर झांकिए, स्वयं के भीतर झांकने से विकृतियों के दुष्परिणाम का बोध हो जाएगा। शिविरार्थियों को उद्बोधन दिया – आप यहाँ जीवन में बदलाव के लिए आये हैं, विकृतियों से अपने आपको बचाएं और अपने भीतर सोई हुई प्रतिभा को जागृत करें और अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए दृढ संकल्पित बनें। प्रभु महावीर ने यही संदेश दिया कि विकृतियों से बचकर प्रकृति की ओर बढिये, जीवन को सुसंस्कारों से संस्कारित करने का पुरुषार्थ करें।

मंच का संचालन संजय पींचा ने किया।मंगलवार को जजसाहब श्रीमान मधुसुदन मिश्रा शिविर निरीक्षण हेतु पधारे, शिविरार्थियों को पुरुषार्थ का महत्व बताकर जीवन में प्रगति करने की प्रेरणा दी। जजसाहब का सम्मान मुल्तानमल मेहता ने संघ की ओर से किया। जजसाहब की धर्मपत्नि ने भी गुरूदेव श्री के दर्शन प्रवचन का लाभ लिया जिनका सम्मान सुशीला कांकरिया ने संघ की ओर से किया।

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